Urjanchal Tiger


उर्जांचल टाईगर विशेष

कभी कभी जिंदगी में ऐसा मौका आता है,जब यह बता पाना मुश्किल होता है कि आप पर क्या गुजर रही है और ये किसी अनजान से लड़ने के संघर्ष जैसा होता है।डिप्रेशन (अवसाद) किसी को, कभी भी,कहीं भी घेर सकता है। WHO के एक अध्ययन के मुताबिक, भारत में 18 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में हर 20वां शख्स डिप्रेशन से पीड़ित है। 

बीते कुछ वर्षों में, योग डिप्रेशन से लड़ने का एक असरदार तरीका बनकर उभरा है। इससे स्ट्रेस और एंग्जाइटी के असर को कम किया जा सकता है और एनर्जी लेवल में सुधार किया जा सकता है। 

आइए जानते हैं,कैसे डिप्रेशन से लड़ने में  चंद मिनटों का योगआपकी मदद करता है?

योग हैप्पी हार्मोंस की सप्लाई

विशेषज्ञों का कहना है कि सेरोटोनिन मुख्य हार्मोन है, जो हमारे मूड को नियंत्रित करता है और हमें खुश रखता है। किसी भी तरह की एक्सरसाइज से शरीर में इस हार्मोन के उत्पादन को बढ़ाने में मदद मिलती है, जो बदले में हमें शांत रखता है। सरल और सुगम योग आसन आपको सकारात्मक विचारों पर ध्यान केंद्रित करने और खुद को खुश रखने में मदद करते हैं!

योग स्ट्रेस और एंग्जाइटी को घटाता है

योग शरीर में तनाव के हार्मोन कॉर्टिसोल के लेवल को कम करने में मदद करता है। गहरी सांस लेने की तकनीक आपको शांत रखने में मदद करती है और आपको तनाव मुक्त करती है। ये आपकी अंतरात्मा की आवाज से जुड़ने में आपकी मदद करता है और आपकी एनर्जी को सही दिशा में ले जाता है। 

योग से आत्मविश्वास बढ़ाता है 

डिप्रेशन अक्सर लगातार आत्मविश्वास में कमी के साथ आता है। और यह सब जानते हैं कि यह किस तरह हमारी जिंदगी को बर्बाद कर सकता है। 

रोजाना योगाभ्यास करने से आपके नकारात्मक विचारों को दूर करने में मदद मिलती है। यह आपके व्यक्तित्व को एक अलग स्तर तक पहुंचने में मदद करता है और आत्मविश्वास पैदा करता है। 

योग पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से निपटने में मददगार

अध्ययनों से पता चला है कि योग PTSD से निपटने में मदद कर सकता है। सुदर्शन क्रिया योग का नर्वस सिस्टम पर अच्छा असर हो सकता है, और लंबे समय तक इसे करते रहने से किसी शख्स के मानसिक संतुलन को बहाल करने में मदद मिल सकती है। 

इसके अलावा, योग आपके दर्द सहने की क्षमता को बढ़ाने में भी मदद करता है। वहीं इसकी मदद से आप उस कभी न खत्म होने वाले पीठ के दर्द और सिर दर्द से बेहतर तरीके से निपट सकते हैं। 

डिप्रेशन एक वास्तविक लड़ाई  जिसका सामना जिंदगी में सभी करते हैं,एक बार  योग को आजमा कर देखिए!  क्या पता यह वही हो, जिसका आप इंतजार कर रहे थे! 


रीता विश्वकर्मा
जिस तरह भक्त शिरोमणि हनुमान जी को उनकी अपार-शक्तियों के बारे में बताना पड़ता था और जब लोग समय-समय पर उनका यशोगान करते थे, तब-तब बजरंगबली को कोई भी कार्य करने में हिचक नहीं होती थी, भले ही वह कितना मुश्किल कार्य रहा हो जैसे सैकड़ो मील लम्बा समुद्र पार करना हो, या फिर धवलागिर पर्वत संजीवनी बूटी समेत लाना हो...आदि। ठीक उसी तरह वर्तमान परिदृश्य में नारी को इस बात का एहसास कराने की आवश्यकता है कि वह अबला नहीं अपितु सबला हैं। स्त्री आग और ज्वाला होने के साथ-साथ शीतल जल भी है।
आदिकाल से लेकर वर्तमान तक ग्रन्थों का अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि हर स्त्री के भीतर बहुत सारी ऊर्जा और असीमित शक्तियाँ होती हैं, जिनके बारे में कई बार वो अनभिज्ञ रहती है। आज स्त्री को सिर्फ आवश्यकता है आत्मविश्वास की यदि उसने खुद के ‘बिलपावर’ को स्ट्राँग बना लिया तो कोई भी उसे रोक नहीं पाएगा। स्त्री को जरूरत है अपनी ऊर्जा, स्टैमिना, क्षमताओं को जानने-परखने की। काश! ऐसा हो जाता तो महिलाओं के साथ अभद्रता, दरिन्दगी, रेप, गैंगरेप और हत्या जैसी अप्रिय एवं दुःखद, अमानवीय घटनाओं पर काफी हद तक नियंत्रण लगता। समाज में छुपे रहने वाले दरिन्दों की विकृत मानसिकता का हर ‘सबला’ मुँह तोड़ जवाब दे सकती है, इसके लिए उसे स्वयं को पहचानना होगा। साथ ही समाज के स्त्री-पुरूष दोनों को रूढ़िवादी विचार धारा का परित्याग करना होगा।

पूरी दुनिया में आधी आबादी महिलाओं की है बावजूद इसके हजारों वर्षों की चली आ रही परम्परा बदस्तूर जारी है। सारे नियम-कानून महिलाओं पर लागू होते हैं। जितनी स्वतंत्रता लड़को को मिल रही है, उतनी लड़कियों को क्यों नहीं? बराबरी (समानता) का ढिंढोरा पीटा तो जा रहा है, लेकिन महिलाओं पर लगने वाली पाबन्दियाँ कम नहीं हो रही हैं। लड़कों जैसा जीवन यदि लड़कियाँ जीना चाहती हैं तो इन्हें नसीहतें दी जाती हैं, और इनके स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। उन पर पाबन्दियाँ लगाई जाती हैं। बीते महीने कश्मीर की प्रतिभाशाली लड़कियों के रॉक बैण्ड ‘परगाश’ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। ऐसा क्यों हुआ? यह बहस का मुद्दा भले ही न बने लेकिन शोचनीय अवश्य ही है।

समाज के मुट्ठी भर रूढ़िवादी परम्परा के समर्थक अपनी नकारात्मक सोच के चलते लड़कियों की स्वतंत्रता को परम्परा विरोधी क्यों मान बैठते हैं? क्या स्त्री-पुरूष समानता के इस युग में लड़के और लड़कियों में काफी अन्तर है। क्या लड़कियाँ उतनी प्रतिभाशाली और बुद्धिमान नहीं हैं, जितना कि लड़के। वर्तमान लगभग हर क्षेत्र में लड़कियाँ अपने हुनर से लड़कों से आगे निकल चुकी हैं और यह क्रम अब भी जारी है। आवश्यकता है कि समाज का हर वर्ग जागृत हो और लड़कियों को प्रोत्साहित कर उसे आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करें। आवश्यकता है कि हर स्त्री-पुरूष अपनी लड़की संतान का उत्साहवर्धन करे उनमें आत्मविश्वास पैदा करे जिसके फलतः वे सशक्त हो सकें। दुनिया में सिर ऊँचा करके हर मुश्किल का सामना कर सकें। लड़की सन्तान के लिए बैशाखी न बनकर उन्हें अपनी परवरिश के जरिए स्वावलम्बी बनाएँ। लड़का-लड़की में डिस्क्रिमिनेशन (भेदभाव) करना छोड़ें।

गाँव-देहात से लेकर शहरी वातावरण में रहने वालों को अपनी पुरानी सोच में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। लड़कियों को चूल्हा-चौके तक ही सीमित न रखें। यह नजरिया बदलकर उन्हें शिक्षित करें। सनद लेने मात्र तक ही नहीं उन्हें घर बिठाकर शिक्षा न दें लड़कों की भाँति स्कूल/कालेज अवश्य भेजे। अब समाज में ऐसी जन-जागृति की आवश्यकता है जिससे स्त्री विरोधी, कार्यों मसलन भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा स्वमेव समाप्त हो इसके लिए कानून बनाने की आवश्यकता ही न पड़े। महिलाओं को जीने के पूरे अधिकार सम्मान पूर्वक मिलने चाहिए। जनमानस की रूढ़िवादी मानसिकता ही सबसे बड़ी वह बाधा है जो महिला सशक्तीकरण में आड़े आ रही है। महिलाएँ चूल्हा-चौका संभाले, बच्चे पैदा करें और पुरूष काम-काज पर निकलें यह सोच आखिर कब बदलेगी?

मैं जिस परिवार से हूँ वह ग्रामीण परिवेश और रूढ़िवादी सोच का कहा जा सकता है, परन्तु मैने अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति से उच्च शिक्षा ग्रहण किया और आज जो भी कर रही हूँ उसमें किसी का हस्तक्षेप मुझे बरदाश्त नहीं। कुछ दिनों तक माँ-बाप ने समाज का भय दिखाकर मेरे निजी जीवन और इसकी स्वतंत्रता का गला घोंटने का प्रयास किया परन्तु समय बीतने के साथ-साथ अब उन्हीं विरोधियों के हौंसले पस्त हो गए। मैं अपना जीवन अपने ढंग से जी रही हूँ, और बहुत सुकून महसूस करती हूँ। मैं बस इतना ही चाहती हूँ कि हर स्त्री (महिला) सम्मानपूर्वक जीवन जीए क्योंकि यह उसका अधिकार है।

इतना कहूँगी कि गाँवों में रहने वाले माँ-बाप अपनी लड़की संतान को चूल्हा-चौका संभालने का बोझ न देकर उन्हें भी लड़कों की तरह पढ़ाए-लिखाएं और शिक्षित बनाएँ ताकि वे स्वावलम्बी बनकर उनका नाम रौशन कर सकें। माँ-बाप द्वारा उपेक्षित लड़की संतान ‘डिप्रेसन’ से उबर ही नहीं पाएगी तब उसे कब कहाँ और कैसे आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा। जब महिलाएँ स्वयं जागरूक होंगी तो वे समय-समय पर ज्वाला, रणचण्डी, गंगा, कावेरी, नर्मदा का स्वरूप धारण कर अपने शक्ति स्वरूपा होने का अहसास कराती रहेंगी उस विकृत समाज को जहाँ घृणित मानसिकता के लोग अपनी गिद्धदृष्टि जमाए बैठे हैं। आवश्यकता है कि स्त्री को स्वतंत्र जीवन जीने, स्वावलम्बी बनने का अवसर बखुशी दिया जाए ऐसा करके समाज के लोग उस पर कोई रहम नहीं करेंगे क्योंकि यह तो उसका मौलिक अधिकार है। न भूलें कि नारी ‘अबला’ नहीं ‘सबला’ है, किसी के रहम की मोहताज नहीं।


Social Media पर आर्टवर्क कहे जाने वाले  दीवार पर टेप से चिपके हुए केले (Banana Tape Artwork) की बीते हफ्ते न्यूयॉर्क में नीलामी हुई। जिसे चीन के जाने-माने क्रिप्टो बिजनेसमैन जस्टिन सन (Justin Sun) ने करीब 52 करोड़ रुपये में खरीदा। खबर यह नहीं खबर यह है कि करोड़ो रूपये के इस केले को खरीदने के बाद अब उन्होंने इसे खा लिया है। केले कॉ खाने के बाद तारीफ करते हुए कहा कि बाकी केलों की तुलना में ये केला बेहतर और स्वादिष्ट है। 

टेप से चिपका केला (Banana Tape Artwork)  केला नहीं है?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, टेप से चिपका केला (Banana Tape Artwork) को इटली के फेमस कलाकार मौरिजियो कैटेलन ने बनाया था, जिसे उन्होंने ‘कॉमेडियन’ नाम दिया। बीते हफ्ते न्यूयॉर्क के सोथबी नीलामीघर में टेप से चिपकाए गए इस केले को जस्टिन सन ने 62 लाख डॉलर (करीब 52 करोड़ रुपये) में खरीदा। 

टेप से चिपका केला (Banana Tape Artwork) खरीदने के बाद जस्टिन सन ने कहा,

यह महज केला नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक घटना को रिप्रेजेंट करता है, जो कला, मीम्स और क्रिप्टोकरेंसी समुदाय की दुनिया को आपस में जोड़ती है। 

टेप से चिपका केला (Banana Tape Artwork) खरीद कर पछतावा हुआ !

हांगकांग के एक आलीशान होटल के स्टेज पर खड़े होकर 29 नवंबर दिन शुक्रवार को  सन ने दर्शकों के सामने 52 करोड़ का केला खा लिया। उन्होंने कहा, “यह दूसरे केलों से बहुत बेहतर है। यह वास्तव में काफी अच्छा है।”

Banana Tape Artwork खरीदने वाले सन ने यह भी कहा कि नीलामी जीतने के बाद पहले 10 सेकंड में उन्हें लगा कि उन्होंने केले को खरीदकर गलत किया है।  फिर उन्हें एहसास हुआ कि इससे कुछ बड़ा बन सकता है। उसके बाद के 10 सेकंड में, उन्होंने फैसला किया कि वह केला खाएंगे। 

Banana Tape Artwork में एक केले को डक्ट टेप के इस्तेमाल से चिपकाया गया है। आर्टवर्क को बनाने वाले कैटेलन का कहना है कि यह आर्टवर्क समाज में हास्य और विडंबना को दिखाता है। 

उर्जांचल टाईगर "विशेष

यदि कोई आपसे आत्महत्या करने जैसी बातें करता है तो संभवतः वो डिप्रेशन(अवसाद)से ग्रसित है, और वह सिर्फ आपको अपनी बात ही नहीं बता रहा है बल्कि वो मदद के लिए चिल्ला रहा है, और आपको उसकी उस वक्त मदद ज़रूर करनी चाहिए। डिप्रेशन(अवसाद) की वज़ह से व्यक्ति आत्महत्या करने तक की सोच सकता है। डिप्रेशन(अवसाद) के दौरान व्यक्ति खुद को बिलकुल असहाय महसूस कर सकता है और उसे सभी समस्याओं  का हल अपनी जिंदगी खत्म करने में नज़र आने लगता है।

हम सभी के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी सफलता मिलने पर बहुत ख़ुशी मिलती है तो कभी असफल होने पे इंसान दुखी हो जाता है।मगर डिप्रेशन यानी अवसाद उससे कहीं ज़्यादा गहरा, लंबा और ज़्यादा दुखद होता है। इसकी वजह से लोगों की ज़िंदगी से रुचि ख़त्म होने लगती है और रोज़मर्रा के कामकाज से मन उचट जाता है। 

क्या होता है डिप्रेशन(अवसाद) ? 

पूरे दावे से तो नहीं बताया जा सका है कि अवसाद किस वजह से होता है, मगर माना जाता है कि इसमें कई चीज़ों की अहम भूमिका होती है। लेकिन ज़िंदग़ी के कई महत्वपूर्ण पड़ाव जैसे- किसी नज़दीक़ी की मौत, नौकरी चले जाना या शादी का टूट जाना, आम तौर पर अवसाद की वजह बनते हैं। 

इनके साथ ही अगर आपके मन में हर समय कुछ बुरा होने की आशंका रहती है तो इससे भी अवसाद में जाने का ख़तरा रहता है। इसके तहत लोग हमेशा सोचते रहते हैं 'मैं तो असफल हूँ'। 

कुछ मेडिकल कारणों से भी लोगों को अवसाद होता है, जिनमें एक है थायरॉयड की कम सक्रियता होना। कुछ दवाओं के साइड इफ़ेक्ट्स में भी अवसाद हो सकता है। इनमें ब्लड प्रेशर कम करने के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएँ शामिल हैं। 

डिप्रेशन(अवसाद) के लक्षण

1- मिज़ाज यानी मूड - सामान्य उदासी इसमें नहीं आती लेकिन किसी भी काम या चीज़ में मन न लगना, कोई रुचि न होना, किसी बात से कोई खुशी न होनी, यहां तक गम का भी अहसास न होना अवसाद का लक्ष्ण है। 
2-  हर समय नकारात्मक सोच होना 
3- नींद न आना या बहुत नींद आना। रात को दो-तीन बजे नींद का खुलना और अगर यह दो सप्ताह से अधिक चले तो अवसाद की निशानी है। 
4 - या तो आपको भूख नहीं लगती या आप बहुत ज्यादा खाते हैं।
5 - आपको लगता है कि ज़िन्दगी जीने लायक नहीं है और आपके मन में अत्महत्या करने का ख़्याल आने लगे।
इतना ही नहीं अवसाद बिना किसी एक ख़ास कारण के भी हो सकता है। ये धीरे-धीरे घर कर लेता है और बजाए मदद की कोशिश के आप उसी से संघर्ष करते रहते हैं। 


कौन हो सकता है डिप्रेशन(अवसाद)?

इसका दो टूक जवाब है - ये किसी को भी हो सकता है। 

डिप्रेशन(अवसाद) आनुवांशिक वजह भी हो सकती है। कुछ लोग जब चुनौतीपूर्ण समय से गुज़र रहे होते हैं तो उनके अवसाद में जाने की आशंका अधिक रहती है। जिन लोगों के परिवार में अवसाद का इतिहास रहा हो वहाँ लोगों के डिप्रेस्ड होने की आशंका भी ज़्यादा होती है। इसके अलावा गुणसूत्र 3 में होने वाले कुछ आनुवांशिकीय बदलावों से भी अवसाद हो सकता है। 


कैसे बचे डिप्रेशन(अवसाद)
  • नींद को नियमित रखना
  • अच्छा खाना और समय पर खाना
  • तनाव तो सभी को होता है लेकिन ऐसा विचार रखना कि इसे कैसे कम रखना है
  • महत्वाकांक्षा को उतना ही रखना जितना हासिल करना संभव हो
  • परिवार के साथ जुड़े रहना
  • अपने कार्य में व्यस्त और मस्त रहना

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